वृक्ष भी बूढ़े होते जैसे इंसाँ बूढ़ा होता है,
समय सभी पर एक ही जैसा अपना रंग दिखाता है।
कल तक जिसकी छाँव के नीचे, राहगीर सुस्ताते थे,
वहीं देखकर सूखी डाली , आँधी से घबराते हैं।
कल तक बाजू बलशाली था ,आकाश को छूने वाला था ,
आज वही लाठी का सहारा, लेकर ही चल पाता है।
वृक्षों के पत्ते झरते हैं, तने की छाल उखड़ जाती,
इंसाँ के काले बालों पर, चाँदी-सी आभा छा जाती।
वृक्षों में भी रोग लगें तो, धीरे-धीरे वे सूख जाते,
इंसाँ भी जब रोगी होता, सपने उसके टूट जाते।
कभी दीमक तने को खा जाती, कभी तना खोखला होता,
वैसे ही रोगों की पीड़ा से, मानव जीवन रोता।
फिर भी बूढ़ा वृक्ष खड़ा , फल-छाया देता रहता है,
अनुभव की मीठी सीखों से, हर पथिक को राहत देता है।
वैसे ही बुढ़ा मनुष्य भी, जीवन का इतिहास लिए,
सुख-दुख, हार-जीत की गाथा, अपने हर विश्वास लिए।
बूढ़े वृक्ष को मत काटो, उसमें वर्षों का मान बसा,
वृद्ध जनों का तिरस्कार न करो, उनमें जीवन-ज्ञान बसा।
जो आज हरे-भरे खड़े हैं, कल उनको भी झुकना है,
प्रकृति का यह शाश्वत नियम है, सबको एक दिन रुकना है।
आओ मिलकर प्रण यह लें, वृक्षों का सम्मान करें,
अपने घर के वृद्ध जनों का, प्रेम सहित सत्कार करें।
वृक्ष और वृद्ध—दोनों ही, जीवन के अमूल्य हीरे हैं,
अपने कल को ध्यान में रखकर,जीवन का उद्धार करें।
-सूबा लाल "अंजाना"
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