काश! ये मानवता का बीज भी,
संपूर्ण धरा पर होता,
नफ़रत, हिंसा और रंजिश का,
विषवृक्ष न इतना होता।
मानव की संरचना में रब ने,
कमी न कोई छोड़ी,
सुगंधित पुष्प-सा तन-मन देकर,
काँटों की सीख भी जोड़ी।
एक रूप, एक रंग, एक ही काया,
पंचतत्त्व का मेल,
प्रकृति ने सबको समान दिया है,
नहीं किया कोई खेल।
अन्न, वायु, जल, अग्नि, धरा, नभ,
सबका अधिकार समान,
फिर भी जाने किस भ्रम में पड़कर,
बाँट दिया इंसान।
जाति, धर्म और ऊँच-नीच की,
दीवारें किसने ढाली?
ईश्वर ने तो एक बनाया,
मानव ने दुनिया बाँटी।
आओ फिर से बीज प्रेम का,
हर हृदय में बो जाएँ,
मानव होकर मानवता का,
सच्चा धर्म निभाएँ।
-सूबा लाल "अंजाना"
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