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बाग़ में अब बहार नहीं आती

                
                                                         
                            माली के उस बाग़ में अब कोई,
                                                                 
                            
फूल नहीं मुस्काता है।
पौधों पर रौनक नहीं दिखती,
न भँवरा मंडराता है।

कलियाँ भी आते-आते,
राहों में रुक जाती हैं।
खिलने का सपना ले आतीं,
फिर वे मुरझा जाती हैं।

हवा में अब वो खुशबू नहीं है,
न नमी कहीं से आती है।
पौधों, फूलों और कलियों को,
प्यार की थपकी न मिल पाती है।

बसंत ने भी जैसे अब तो,
बाग़ में आना छोड़ दिया।
तितलियां भी रूठ के उनसे,
अपना नाता तोड़ लिया।

सूनी डालें, सूने पत्ते,
सूना-सूना हर कोना है।
जिस बाग़ में खुशियाँ बसती थीं,
आज वहाँ बस रोना है।

माली! सोचा, कहाँ चूक हुई है,
क्यों उजड़ा गुलशन सारा है?
प्यार, देखभाल और अपनापन ही,
बाग़ का सच्चा सहारा है।

प्रेम मिले तो फूल खिलेंगे,
फिर महकेगा हर उपवन।
स्नेह-सुधा से सींचो इसको,
लौट आएगा फिर मधुबन।
— सूबा लाल “अंजाना”
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59 मिनट पहले

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