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अंधेरी रात से डरना नहीं तुम

                
                                                         
                            अंधेरी रात से डरना नहीं तुम,
                                                                 
                            
यह ज़िंदगी का एक सफर है।
भोर की पहली किरण है बताती,
हर तम के आगे नवप्रभात का पहर है।

विषमताओं से जो घबराए,
उसका अधूरा ही सफ़र है।
संघर्षों की धूप में तपकर,
जीवन जाता निखर है।

फल से लदा हुआ जो तरु हो,
सबकी उसी पर नज़र ठहरती।
झुकना उसकी विनम्रता है,
यही प्रकृति की है श्रेष्ठ प्रकृति।

थोड़ा धैर्य धारण कर लेना,
समय सभी का रूप बदलता।
प्रकृति सदा संतुलन है रखती,
दुःख के पीछे सुख भी चलता।

इसलिए निराश न हो साथी,
आशा का दीप जलाए रखना।
हर अँधेरी रात के बाद ही,
सूरज की भांति मुस्कान रखना।
-सूबा लाल "अंजाना"
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3 महीने पहले

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