आँखें सारी कथा बयाँ करती हैं,
बिन बोले सब कुछ कहती हैं।
किसके दिल में क्या पलता है,
किसकी धड़कन क्या कहती है।
इन आँखों में ऐसा जादू है,
मन का दर्पण बन जाती हैं।
मासूम से बच्चे का रोना,
दुख-दर्द सभी बतलाती हैं।
आँखें आत्मा का दर्पण हैं,
बिन शब्दों के भी बोलती हैं।
जब लफ़्ज़ ज़ुबाँ तक आ न सकें,
तब मन के राज़ खोलती हैं।
ज़ुबाँ झूठ का सहारा लेकर,
सच को अक्सर छिपा लेती है।
पर आँखें दिल की गहराई में,
छिपी व्यथा दिखला देती हैं।
जो अश्क अधूरे रह जाते,
जो पलकों में ठहर जाते हैं।
जो गिरकर धूल में बिखरें,
वे दर्द की कथा सुनाते हैं।
आँखें केवल आँखें ही नहीं,
ये मन की सच्ची भाषा हैं।
इनमें प्रेम, विरह और वेदना,
जीवन की अमिट परिभाषा हैं।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
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