आज ये धरती टूट रही है,अपनों से ही जूझ रही है।
अपनी ही संतानों से अब,रक्षा के हित पूँछ रही है।
कुछ कपूत मेरे ही तन को,टुकड़ों में विभाजित हैं करते।
सीना चीर-चीरकर मेरा,सड़कें, पुल और भवन हैं गढ़ते।
संपूर्ण धरा के वन-उपवन,निर्दय होकर काट रहे।
जीवन देने वाले तरुओं को,प्रतिदिन यूँ ही बाँट रहे।
खनिज निकाल-निकाल कर,पर्वत को खोखला करते।
लोभ और अंधी दौड़ में,प्रकृति का संतुलन हरते।
नदियाँ रोतीं, झरने सूखे,सूनी होती हरियाली है।
मानव! अब भी चेत न पाया,कितनी बड़ी बदहाली है।
जिस धरती ने जन्म दिया है,उसका ऋण कब चुका पाओगे?
यदि माँ का सम्मान न करोगे,तो अपना कल कहाँ बचाओगे?
-सूबा लाल "अंजाना"
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