आज रो रही धरती माता, अपने ही संतानों पर,
अपनी ही संस्कारों में पले, क्रोधित है अपमानों पर।
जिस धरती की मान-संस्कृति, कभी हुआ करती थी,
भारतवर्ष का नाम ये दुनिया, गर्व से लिया करती थी।
व्यंग्य कर रही, हँसी उड़ा रही, मान मिला जो मिट्टी में,
सत्य, अहिंसा, प्यार-मोहब्बत, बसते थे जिस धरती में।
ईमानदारी की मिसालें, सदियों दी जाती जिसकी,
देश के ओहदेदारों ने ही, मिट्टी पलीद की उसकी।
देश की जनता घर में बैठी, दुर्व्यवस्था देख रही,
देशहितैषी मर्यादा की रक्षा में संघर्ष कर रहे।
लोग त्रस्त हैं घोर अँधेरे में, देश को डूबता देख रहे,
पढ़े-लिखे मजबूर खड़े हैं, अधिकारी भी मौन रहे।
जिनसे जीवन की आशाएँ थीं, जिन पर था विश्वास किया,
जिनको सौंपा देश का भविष्य, जिन पर था अभिमान किया।
आज उन्हीं के द्वार खड़े हैं, न्याय माँगते लोग यहाँ,
अपनों के शासन में भी क्यों, बेसहारा हैं लोग यहाँ?
प्रदर्शन होते रहे सड़कों पर, उठती रहीं हैं qआवाज़ें,
न्याय की खातिर गूँज रही हैं, जनता की सब फरियादें।
फिर भी सुधारों की किरणें, नज़र कहीं क्यों आती नहीं?
जनता की पीड़ा सत्ताधारी, सुनने क्यों आ पाती नहीं?
सत्य और ईमानदारी का, कैसा दौर चला आया,
झूठ और छल के आगे सच ने, क्यों सिर अपना झुकाया?
सेवा का संकल्प कहाँ है, कहाँ गई कर्तव्यनिष्ठा?
किस चौखट पर जाकर माँगें, न्याय, सत्य और प्रतिष्ठा?
पद यदि केवल सत्ता का सुख, धन अर्जित करने का साधन,
तो फिर जनसेवा का सपना, कैसे होगा कभी सफल?
कुर्सी जनसेवा का माध्यम, नहीं किसी की जागीर है,
जनता की आशाओं से बढ़कर, कोई नहीं तकदीर है।
शिक्षित युवा भटक रहे हैं, रोजगार की आस लिए,
मेहनतकश परिवार जी रहे हैं, सपनों का उपवास लिए।
किसान पसीना बहाता है, श्रमिक खून सुखाता है,
फिर भी उसके घर का चूल्हा, मुश्किल से जल पाता है।
न्याय अगर बिकने लग जाए, सच को कौन बचाएगा?
रक्षक ही भक्षक बन बैठे, तो किसको दोषी पाएगा?
कानूनों की गरिमा पर जब, प्रश्नचिह्न लग जाता है,
जनता का विश्वास व्यवस्था से, धीरे-धीरे हट जाता है।
आज देश का भविष्य देखकर, मन में उठते सवाल हैं,
क्या बस इतनी ही प्रगति के, हमने देखे थे ख्वाब ये?
क्या आज़ादी का अर्थ यही है, जनता केवल सहती जाए?
अन्यायों के बोझ तले वह, चुपचाप सिसकती जाए?
धरती माता पूछ रही है, कब तक मुझे रुलाओगे?
अपने स्वार्थों की खातिर कब, देश को और झुकाओगे?
जिस मिट्टी ने जन्म दिया है, उसका कर्ज चुकाना है,
सत्ता हो या जनता, सबको अपना धर्म निभाना है।
अब भी समय है, जागो लोगो, सच की अलख जगानी है,
नफरत की दीवार गिराकर, प्रेम-ज्योति जलानी है।
हिंसा नहीं, विवेक हमारा, परिवर्तन का अस्त्र बने,
न्याय, सत्य, समता के पथ पर, भारत फिर से अग्रसर चले।
सत्ता में बैठे लोगों को, जनहित का एहसास हो,
हर निर्णय में न्याय झलके, हर वंचित के पास आस हो।
ईमानदारी फिर से भारत की, सच्ची पहचान बने,
संविधान के आदर्शों से, मेरा देश महान बने।
धरती माता रोए क्यों अब, संतानें जब जागेंगी,
सत्य, प्रेम और न्याय की राहें, फिर से जब वे चुनेंगी।
भारत की गरिमा लौटेगी, जन-जन का सम्मान बढ़ेगा,
मिलकर देश सँवारेंगे हम, तभी नया भारत ये बनेगा।
-सूबा लाल ‘अंजाना’
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