घर की चौखट पर बैठी माँ,
साँझ ढले कुछ गाती है,
दिनभर की थकी हुई आँखों में,
फिर भी नींद कहाँ आती है।
चूल्हे की धीमी आँचों में,
ममता रोज़ पकाती है,
सबकी थाली भर जाने पर,
अपनी भूख मिटाती है।
मेरी छोटी-सी जरूरत पर,
अपनी चाह भुलाती है,
मेरे फटे हुए सपनों को,
फिर से सिलना सिखाती है।
मैं जब घर से दूर निकलता,
बस इतना कह जाती है—
“अपना ख्याल रखना बेटा”,
और आँखें भर आती हैं।
मैं कह देता हूँ—“माँ, मैं ठीक हूँ”,
वो चुप होकर रह जाती है,
मेरी आवाज़ के पीछे छिपी,
हर चिंता पढ़ जाती है।
माँ हर बात नहीं कहती,
उसकी खामोशी बोलती है,
कभी उसके पास बैठ जाना,
उसकी आँखें खोलती हैं।
हम दुनिया को जीतने निकले,
वो घर को घर करती रही,
हम अपने कल के सपनों में,
वो अपना आज धरती रही।
हमने उसकी उम्र न देखी,
बस अपनी उम्र बढ़ाते रहे,
वो हमारे कल की खातिर,
अपने आज मिटाती रही।
कभी लौटो तो उसके पास,
थोड़ा वक्त बिताना तुम,
जिसने जीवन दे दिया तुम्हें,
उसका हाल भी पूछ आना तुम।
माँ को महलों की चाह नहीं,
न चाँदी, न सोना चाहती है,
बस जब थककर बेटा लौटे,
तो उसके चेहरे की मुस्कान चाहती है।
दुनिया चाहे नाम दे तुम्हें,
दौलत दे या सम्मान दे,
पर माँ की आँखों में अगर,
तुम अच्छे हो—तो सब कुछ है।
माँ केवल एक रिश्ता नहीं,
घर में जलता दीपक है,
जिसकी रोशनी में हम जीते हैं,
और जिसे हम अक्सर
जलता हुआ देख नहीं पाते हैं।
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