आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आषाढ़ के बादल बरस गए

                
                                                         
                            आषाढ़ के बादल फिर आ गए
                                                                 
                            
कभी दिल, कभी आँखों में छा गए

कभी लाल- काले बादल बन छा गए
कभी सफेद बादलों का समूह बन गए

कभी गरज, कभी बिजली चमका गए
कभी हवाओं के संग सब दूर चले गए

कभी रिमझिम, कभी घने बरस के गए
कभी तूफान, कभी आंधी संग बरस गए

कभी धूप,कभी अंधेरा करके चले गए
कभी बरसे, कभी बिन बरसे चले गए

कभी सूखी ज़मीन को भीगा के चले गए
कभी पहाड़ों में बादल फट के चले गए

कभी ख़ुशी, कभी गम देके चले गए
कभी खुद ही के आंसू बन बरस गए

मानसून की दस्तक देके चले गए
आषाढ़ के बादल अब के बरस गए।
-सोनी रावत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर