आषाढ़ के बादल फिर आ गए
कभी दिल, कभी आँखों में छा गए
कभी लाल- काले बादल बन छा गए
कभी सफेद बादलों का समूह बन गए
कभी गरज, कभी बिजली चमका गए
कभी हवाओं के संग सब दूर चले गए
कभी रिमझिम, कभी घने बरस के गए
कभी तूफान, कभी आंधी संग बरस गए
कभी धूप,कभी अंधेरा करके चले गए
कभी बरसे, कभी बिन बरसे चले गए
कभी सूखी ज़मीन को भीगा के चले गए
कभी पहाड़ों में बादल फट के चले गए
कभी ख़ुशी, कभी गम देके चले गए
कभी खुद ही के आंसू बन बरस गए
मानसून की दस्तक देके चले गए
आषाढ़ के बादल अब के बरस गए।
-सोनी रावत
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