मेले में खिलौने बेचते बच्चे,
उम्र से कच्चे, मगर दर्द से पक्के,
हाथों में खिलौने हैं, पर किस्मत में नहीं,
मोल-भाव करती भीड़, पर समझती नहीं,
उनके सपने मेले से बड़े नहीं होते,
एक वक्त की रोटी से परे नहीं होते।
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