हम को जीने का बहाना तो मिले ,
सर झुकाने को ठिकाना तो मिले.
पहले जैसा हो तो जाऊँगा , मगर ,
मुझको वो गुजरा जमाना तो मिले.
धूप निकले, बर्फ तो पिघले जरा,
फिर नज़ारा, इक सुहाना तो मिले.
लौट कर पंछी, कहाँ जाये भला?
उसको अपना आशियाना तो मिले.
सुनते सुनते नींद आ जाये, जिसे,
कोई इक ऐसा फ़साना तो मिले.
खुद ब खुद साकी,सम्हाले रिन्द को,
ऐसा कोई, लड़खड़ाना तो मिले.
इस चमन में भी बहार आ जाएगी,
बाग को माली, सयाना तो मिले.
खुल के जिस से कह सकूँ, मैं हाल ए दिल,
मुझ को, मुझ जैसा दिवाना तो मिले.
ओस की बूँदे, कमल के फूल पर,
गा उठें, ऐसा तराना तो मिले.
-सोमेश शर्मा
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