मैं तो खुद को खोते चली हूँ
तुम्हारी राह पर
पहली बार मेरा अहं
तुमने नष्ट कर दिया है
तुम्हारे देखने भर से
हृदय जीवीत हो उठता है
मैंने अपने हृदय का
हर एक कोना
तुम से भरा है
किसी भी स्वार्थ से परे,
मोह से परे
किसी सीमा से परे
और
शायद सुदामा की
मित्रता से बढकर ,
शायद राधा के प्रेम से बढ़कर ,
शायद मीरा के
भक्ती से बढ़कर
मैंने तुम्हे अपनाया है
यह खुद को खुद में पाना
लगता है मानो
यही अंतीम सत्य है
इस जीवन का ....
शायद ....
- सोनाली
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