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बेटी की विदाई

                
                                                         
                            बेटी की विदाई
                                                                 
                            
उसे घर से विदा होते देखा,
बिन माँ की बेटी को मैंने—
“पापा” कह कर रोते देखा।
“इतनी क्या जल्दी थी पापा?
क्या रूठ गए हैं मुझसे पापा?
मैं तो अभी बच्ची हूँ पापा!”
मानो, ऐसा कहते देखा।
“समय पे खाना खाना पापा,
नियत दवाएँ लेना पापा,
अपना ख्याल रखना पापा;”
सजल नयन से कहते देखा।
“क्या पापा! तुम रूठ गए हो?”
“बेटी, पापा न रूठे हैं,
तेरी खुशियों के भूखे हैं।
बेटी, यह तो नियम अटल है,
तुझको जाना अपने घर है।“
“फिर पापा! यह घर था किसका?”
पापा कुछ न बोल सके फिर,
क्षण भर को न डोल सके फिर।
“तू मेरी लाडो बेटी है,”
पापा को बस कहते देखा,
उस दुःख को भी सहते देखा।
“पुनः न बेटी पूछे मन में—
फिर पापा! यह घर किसका है?”
इतना कह, फिर विदा हुई वह...
वह रोई, मैं भी रोया था,
अंतर्मन खोया-खोया था;
उस रात न ढंग से मैं सोया था।
ईश्वर! क्या तू न रोया था?
तू भी तो रोया ही होगा?
ढंग से न सोया ही होगा?
जब पुनः तू सृष्टि रचना,
नियम तू अपना ज़रा पलटना!
पुनः न घर बेटी का छूटे,
अटल नियम यह जग का टूटे...!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

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