तुम्हारा इंतज़ार नही हैं अब मुझे
तुमपर मरने वाले बहुत हैं,
मेरे इश्क़ की क्या ही क़दर होगी
तुम पर दिल लुटाने वाले बहुत हैं
मेरे होने ना होने से क्या फ़र्क पड़ेगा
तुमसे बात करने वाले बहुत हैं
मेरी जरूरत नहीं हैं अब तुम्हें
तुम्हारा मन बहलाने वाले बहुत हैं
मेरी बांहों मे अब वो सुकून कहाँ
तुमसे लिपटने वाले बहुत हैं
पर,
जब मैं सोचती हूं औरों को,
करीब जाती हूं औरों के,
हस कर जब बातें करती हूं औरों से,
औरों को देख कर जब मैं जुल्फ़े और भी बिखेर लेती हूँ
शर्मा कर जब मैं पलकें को हल्का खुला छोर कर हल्का झुका लेती हूं
जब तुम्हारा हक़ मुझ पर कोई और जताता हैं
मैं जानना चाहती हूँ,
क्या ये सब ख़ाक नहीं करता दिल तुम्हारा
खैर,
तुम्हें इससे क्या फ़र्क पड़ता हैं
दिल में तुम्हारे घर बनाने वाले भी तो बहुत हैं!
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