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मलबे के मालिक

                
                                                         
                            मलबे के मालिक-
                                                                 
                            

किले ढह रहे हैं
उन्हीं परिचित किनारों पर,
जहाँ गम निकलता है
नदियों के किनारों का
और दीवारों को सुध भी नहीं है
उनके दम घुटने की, वजूद मिटने की
जो दशकों से खड़ी थीं
अजीब कशमकश धारण किए,
वे गवाह थीं निर्दोषों की हत्याओं की
घटित व्यभिचारों की मूक दर्शक थीं,
मगर छत तो खिलाड़ी थी
वो पर्दा थी गुनाहों पर, गुमानों पर
और सहचर थी दीवारों की
मगर कुछ रंगीनियाँ थीं उसमें
वो महफ़िल को सजाती थी,
खटकती रहती हैं झूमर की यादें
जो दीवारों से रंज रखता था,
वो आज दफ़न है उसी मलबे में
सहज होकर, सरल होकर।
सराहना से भरे हैं मुंडेरों के किनारे
जहाँ पर अश्क बहकर के
कनखियों से गुजरते थे,
अभी कुछ उम्र बाकी है
किले के राज बागों की
उन्हीं आरामबागों की
जहाँ दिग्गज मोहब्बत को समझते थे।
वे शान से ताउम्र खड़े रहे
शौर्यता के चारण बन
बचे जो अब भी बाकी हैं
वे सब मलबे के मालिक हैं।

- सिद्धार्थ अजेय


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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