घाटों पर बिखरी वो पहली किरण,
और चाय की प्याली से उठता धुआँ,
एक हाथ में डायरी, दूजे में ख्वाब,
मेरा हर एक दिन बस यहीं से शुरू हुआ।
कभी बहते खयालों की एक मौज थी,
कभी शब्दों में बहती थी ये जिंदगी,
कभी रंगों से कैनवस सजाती रही,
कभी गजलों में सजती थी ये सादगी।
मगर वक्त बदला, तो बदले हैं हम,
अब सुबह में एक नया संकल्प है,
वही राहें बनारस की, पर अब जहन में—
लक्ष्य को पाने का पक्का विकल्प है।
किताबों के पन्नों में डूबी सुबह,
अब गहरे ज्ञान की नई राहें बुनती है,
ये शुभांगी आनंद की नई एक डगर है,
जो कला के साथ अब कर्तव्य चुनती है।
डिसिप्लिन की राह पर बढ़ते कदम,
पर दिल में वो ठहरी हुई शायरी है,
अब खुद को गढ़ने का हौसला है बड़ा,
और वही जज्बातों भरी डायरी है।
-शुभांगी आनंद
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