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प्रेम का द्वंद्व

                
                                                         
                            बात जब अस्तित्व के संघर्ष की होती है...
                                                                 
                            
मैं और मैं का प्रेम अक्सर अड़ जाता है..
मै का दरवाज़ा आगे आता है
और प्रेम खिड़की से झांकता है...

खिड़कियां प्रेम को मुक्त रखती हैं बांधती नहीं..
खिड़कियों में अहंकार नहीं होता...
क्यूँ कि वो एक तरफ खुलती हैं...
वो सहमति नहीं सम्मान देती हैं..
.
पर दरवाज़े हमेशा डराते हैं....
वो अधिकार छीन लिया करते हैं.....
प्रेम को देहरी के पार रखते हैं....
और कभी कभी नष्ट भी कर देते हैं....

इसीलिए प्रेम पुस्तक मे आ गया है
जिसके शब्द वर्णों के पुष्प से बँध जाते हैं
इनकी चिर सुगंध बना देती है मोह पाश
जो कस कर पकड़ लेते हैं मन के सारे भाव

प्रेम सूरज तो है नहीं जो अस्त हो जाए
या कहीं भी उग जाए..,
पर प्रेम में जो रोशनी है.
वो न तो मध्यम होती है...
न ही क्षीण होती है कभी भी...
सुनहरा उजाला लिए होती है....

प्रेम अंतर्मन की किताब का अलंकार होता है
जिसमें श्रृंगार सारे प्रेमी शब्द करते हैं
जहां त्रुटियों की जगह ही नहीं है.
और स्वच्छ भाव सुंदर छवि खोज लेते हैं
इसके चैप्टर और पन्ने बड़े आकर्षक हैं..
और प्रेम के प्रश्न हर माया से परे
है...
जिनके उत्तर सिर्फ प्रेम के पास है

फिर भी..
कुछ शब्द टूट जाते हैं. कुछ घायल भी...
भाषा भी बोझिल होने लगती है...
तब जाकर कविता बनतीं है....
और जीवन के शोरगुल से एकांत को ढूंढती है...

प्रेम ने बहुत असंभव चीजों को खोजा....
उसने खोजी गहरी पीड़ा और आंसू
आँखों की भाषा और मौन का संतुलन
और सुंदरता का सही रूप प्रेम ने ही खोजा...

ख़ुद से, प्रकृति से, जीव से, ईश्वर से...
प्रेम करना ही प्रेम की सुंदरता है...
धनुष और बंसी प्रेम के लिए टूट जाते हैं...
और जन्म जन्मांतर के मोह बीज
भी फूट जाते हैं..

इन सबमें असंभव सा काम प्रेम ने ही किया...
जो उसने इंसान को एक नेक इंसान बनाया....
और बताया प्रेम जीवित रहने की निशानी है..
और चिर काल तक उसकी खोज में लगा रहेगा....

 
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3 महीने पहले

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