जो समझें हम, समझो तुम भी वही, ज़रूरी तो नहीं।
नज़रीया जो मेरा है, तुम्हारा भी हो , ज़रूरी तो नहीं।
दायरा हर एक ज़हन की सोच का जुदा होता है,
सब तुम्हारे दायरे में सिमट जाएँ, ज़रूरी तो नहीं।
इन आँखों से जो दिखाई देता है हमें हर जगह हर पल,
मुकम्मल सच सिर्फ़ वही हो, ज़रूरी तो नहीं।
मोहब्बत कभी किसी शर्त की मोहताज़ नहीं होती,
हम चाहें शिद्दत से, वो भी हमें चाहे, ज़रूरी तो नहीं।
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