बची नहीं दिल में वफ़ा तकल्लुफ़ की ज़रूरत क्या?
मेरा दर्द सिर्फ़ मेरा है, झूठी हमदर्दी की ज़रूरत क्या?
बदलते वक़्त ने जब सिखा ही दी सब दानाई,
तो अब इस मोड़ पर नसीहत की ज़रूरत क्या?
हो पतझड़ या हो सावन, जीना है हर हाल में अगर,
क्यों न हँस कर जिएं हम, फिर रोने की ज़रूरत क्या ?
हुई है इंतहा ग़म की, ख़त्म हुए दौर -ए- ग़ुरबत भी,
भर गए जब ज़ख़्म सारे मरहम की ज़रूरत क्या?
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