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वो रात थी पूनम की

                
                                                         
                            क्या सुनाऊँ सारे जहाँ को दास्ताँ अपने ग़म की,
                                                                 
                            
किस कदर, किस-किस ने आँखें मेरी नम की।

कहने को बहुत कुछ था, जो हम कहने पे आते,
मगर भुला दी हमने कहानी हर उस सितम की।

चलो वो सब सच मान लिया,जो कुछ भी तुमने कहा,
रूसवाई भला क्यों करें, हम अपने सनम की।

हमने मिलकर की थी उम्र भर न मिलने की बात,
हुआ था जब ये फ़ैसला वो रात थी पूनम की।

भारी क़दमों से जाते हुए बार-बार देखा था उसने मुझे,
मैं एक क़दम बढ़ा न सकी-- याद थी बात क़सम की।

कटती है तो कट जाए ज़िंदगी अब तम के साये में,
हमने ओढ़ ली यादों की झीनी चदरिया शबनम की।
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2 महीने पहले

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