किसी कमज़र्फ को शराफ़त का तुम नाम न दो,
सादिक़ों को कभी बेवफ़ाई का इल्ज़ाम न दो।
अपना समझ कर जिसने भी प्यार दिया तुमको,
अनमोल है रिश्ता उसका--कोई दाम न दो।
दिख जाए अगर चेहरे में सीरत हैवानियत की,
तो फिर चाहे वो कोई भी हो, उसे इकराम न दो।
जिसने किया छल, छोड़ दो उसको उसके हाल पर,
वक़्त ख़ुद करता है हिसाब-- तुम इंतकाम न लो।
जिन्हें फर्क़ पड़ता ही नहीं तुम्हारे किसी हाल से,
ऐसे रिश्तों को भूल जाओ, कोई पैगाम न दो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X