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उसकी रुख़्सत पर

                
                                                         
                            तुम मिले तो लगा जैसे ग़मगुसार मिल गया,
                                                                 
                            
दिल की दास्तां सुनाने का इख़्तियार मिल गया।

मगर कह न सकी कभी, जो बात दिल में रही,
तुमने जो वादा तोड़ा, तो वो क़रार रह गया।

जिसकी चाहत थी बरसों से, वो जब तुम्हें मिला,
मिलते ही तुमने कैसे उसे दरकिनार कर दिया?

तुम्हारे दिए अश्कों को दामन में छुपाया मुद्दतों तक,
और तुम्हें लगा कि तुमने उपकार कर दिया।

माज़ी को याद कर के होंठ कभी खिले नहीं,
उसकी रुख़्सत पर मैंने ये इज़हार कर दिया।
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13 घंटे पहले

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