जब उनकी उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतरते,
तो उनकी महफ़िल में भला कब तक रहते।
अपनी मर्ज़ी से कहाँ सबकुछ होता है दुनिया में,
इख़्तियार होता तो हम भी सिर्फ़ हँसते रहते।
तोहमत लगाने से पहले लाज़िम है हक़ीक़त जानना,
चाहत सच की होती तो क़यास नहीं लगाते।
नासमझ हैं जो, गुमराह न करें किसी को वो,
दिल टूट जाता है ऐसे, वो क्यूँ नहीं समझते।
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