मलाल क्या करें उसका, जो हमें मिला नहीं,
हासिल जो वो कम नहीं, क्यूँ सोचें कुछ मिला नहीं।
हर ग़म की वजह अपनी, ये सोच ही तो होती है,
दर्द मिले भी तो सोचें किसी से कोई गिला नहीं।
गर नेकी की किसी से, बेहतर यही कि भूल जाएं,
फ़रामोशों से भी न कहें कि, ये तो कोई सिला नहीं।
अपना समझ सुनाई जिसे, ग़म-ए-दास्ताँ अपनी,
उम्मीद थी जैसी उनसे, जवाब वैसा मिला नहीं।
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