दिल जल रहा है पर धुआँ दिख नहीं रहा,
टूटा ये कई बार मगर दरार दिख नहीं रहा।
दर्द के मोती जो आँखों से ढलक रहे हैं,
मोती दिख रहे लेकिन दर्द दिख नहीं रहा।
ऐसा लगता है ज़ब्त की अब तो इन्तहाँ हो गई,
इब्तिदा कब हुई थी, कुछ भी याद नहीं रहा।
वो इक शख़्स जिसपर दिल- ओ- जाँ लुटाया मैंने,
अब भी वो मेरा है बावजूद इसके मेरा नहीं रहा।
ऐसा लगता है शुबहा की दीवार में चुनवा दिया मुझे,
अपनी सफ़ाई में कुछ कहने का अब मतलब नहीं रहा।
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