और कितना करोगे सितम, क्या दिल नहीं भरा?
अब तो हम हो गए दूर, फिर क्यों दिल नहीं भरा?
इक बार तुम सुन तो लेते पूरी दास्ताँ मेरी,
जज़्बात करने थे बयां, अभी दिल नहीं भरा।
हंसने गई थी जहाँ, मिले सिर्फ़ आँसू ही वहाँ,
रोती रही मैं ज़ार-ज़ार, पर दिल नहीं भरा।
पेश किया जिसे ग़ुलाब, निकला वो संगदिल,
कुचल दीं पत्तियॉं, फिर भी दिल नहीं भरा।
वो सबकुछ था मेरा जो बन गया ग़ुबार सा,
ओझल होने तक देखा उसे, पर दिल नहीं भरा।
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