बेवफ़ा तुम हुए, तो भला रोएँ क्यों हम,
बेहतर यही है भूल जाएँ तुमको अए सनम।
जज़्बा न था जब मंज़िल-ए-उल्फ़त तक जाने का,
चले थे क्यों साथ मेरे बस दो चार क़दम।
दुआ है मेरी तुम्हें भी कभी याद न आए मंज़र कोई,
भूल जाओ वो सब जो तुमने खाई थी क़सम।
पहरों हुआ करती थी बातें जहाँ, सूनी हैं वो गलियाँ,
सवाली हैं आँखें, कहाँ खो गया वो हम-दम।
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