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बस दो चार क़दम

                
                                                         
                            बेवफ़ा तुम हुए, तो भला रोएँ क्यों हम,
                                                                 
                            
बेहतर यही है भूल जाएँ तुमको अए सनम।

जज़्बा न था जब मंज़िल-ए-उल्फ़त तक जाने का,
चले थे क्यों साथ मेरे बस दो चार क़दम।

दुआ है मेरी तुम्हें भी कभी याद न आए मंज़र कोई,
भूल जाओ वो सब जो तुमने खाई थी क़सम।

पहरों हुआ करती थी बातें जहाँ, सूनी हैं वो गलियाँ,
सवाली हैं आँखें, कहाँ खो गया वो हम-दम।
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2 महीने पहले

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