आईना झूठ भी तो बोलता है,
चेहरा हंसता है और दिल रोता है।
वो समझता नहीं जज़बात हमारे,
बस ख़ामोशी से हमें देखता है।
वो तो बेजान सिर्फ़ एक शय है,
हम जो दिखाते हैं, वही दिखाता है।
गुनहगारों को नींद तब आती है,
जब वो अपनी नज़रें उससे चुराता है।
थोड़ी तसल्ली तो उसे मिलती है,
जो कुछ वक़्त साथ उसके बिताता है।
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