कांटों से सजी ये जिंदगी, यहां हर दम फूल बिछाते कैसे ? चलते - चलते कब चुभ जाये, हर वक्त बचकर पाते कैसे ?.
नीले से इस अम्बर से काले बादल आते कैसे ? बारिश की बून्दों की तरह लोग बिछड़ जाते कैसे ?
ये दुनिया इतनी भोली दिव्यूढी, पर इतना जहर बुनाती कैसे ?
मतलबी चाल चले, हर वक्त इंसानियत बेच याती कैसे ?
पत्थर को देख लोग तो, पत्बर भी अब बन जाते कैसे ? जब लूट चुका समाज तो, इज्जत अब अपनी बचाते कैसे ?.
आंखों से आंदों मिलाते कैसे अब आंखों में हैं आंसू लिए, बेशर्म - सी हांसी छिपाते कैसे ?.
बुराईयां बढ़ती जा रही, देखा समाध तो पता चला, हर युगों में अन्त अति 'कैसे ?.
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