आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काटो से सजी जिंदगी

                
                                                         
                            कांटों से सजी ये जिंदगी, यहां हर दम फूल बिछाते कैसे ? चलते - चलते कब चुभ जाये, हर वक्त बचकर पाते कैसे ?.
                                                                 
                            
नीले से इस अम्बर से काले बादल आते कैसे ? बारिश की बून्दों की तरह लोग बिछड़ जाते कैसे ?
ये दुनिया इतनी भोली दिव्यूढी, पर इतना जहर बुनाती कैसे ?

मतलबी चाल चले, हर वक्त इंसानियत बेच याती कैसे ?
पत्थर को देख लोग तो, पत्बर भी अब बन जाते कैसे ? जब लूट चुका समाज तो, इज्जत अब अपनी बचाते कैसे ?.
आंखों से आंदों मिलाते कैसे अब आंखों में हैं आंसू लिए, बेशर्म - सी हांसी छिपाते कैसे ?.
बुराईयां बढ़ती जा रही, देखा समाध तो पता चला, हर युगों में अन्त अति 'कैसे ?.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर