मुझे घर की याद आ रही है
अब घड़ी मन को बहला रही है
वो मां का बनाकर रोटी खिलाना
खाने से पहले मंदिर को जाना
मां मुझे जल्दी सवेरे जगा देती थी
और घर आंगन को चमका देती थी
पिताजी उठकर सुबह सवेरे
लगा लेते थे आंगन के फेरे
और बचपन मेरा था चुलबुला सा
बीत गया जैसे पानी के बुलबुला सा
वो जाना मंदिर की पाठशाला
प्रार्थना कर कामना हो जग में उजाला
याद है मुझको गाँव का तराना
गेहूं के खेतों में जाकर सो जाना
खेतों के निकट पहाड़ पे चढ़ना
मन कह रहा है नए गीत गढ़ना
गांव की हवा बहुत कुछ कहती है
पालने में आंगन के जो सदा रहती है
रात में छत पर बिस्तर में सोना
जैसे वहां की रात थी कोमल खिलौना
और वह खिलौना मन भा गया है
शहर का शोर कितने गांव खा गया है
यहां कोई इंसान जीता नहीं है
गांव का दौर अभी बीता नहीं है
और इक आवाज मन में आ रही है
वो शायद मुझे गांव बुला रही है
मिलेगा गांव मुझको मैं आश्वस्त हूं
मैं अभी लेकिन शहर में व्यस्त हूं।
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