डूब समंदर में धँस जाऊँ, चाह यही है उफ़ानों की,
उड़कर झाड़ों में फँस जाऊँ, चाह यही है तूफ़ानों की,
मेरे पाँवों की मिट्टी भी धँसकर खाई बन जाए गर,
बन जाऊँ मैं स्वयं रुकावट, पथ के सारे व्यवधानों की।
मैं उड़ान भरता ही रहूँगा, पंख मेरे जब तक काबिल हैं,
तूफानों से मिलूँ हमेशा, नाव मुझे जब तक हासिल है,
इम्तिहान के हम आदी हैं, इश्क़ नहीं है अंजामों से,
दिशा अनिश्चित, पंथ अपरिचित, चलना ही मेरी मंज़िल है।
आरोहण से थक जाऊँ मैं, साज़िश है ये चट्टानों की,
रुक जाऊँ मैं, झुक जाऊँ मैं, साज़िश ये रेगिस्तानों की,
बाधाओं को खुली चुनौती, "और बनाएँ पथरीले पथ",
विपदा व व्यवधान बनेंगे, शोहरत मेरे सम्मानों की।
जन्नत को श्मशान बना दूँ, मुर्दों को पहचान बना दूँ,
खंडहरों को, वीरानों को, महल और उद्यान बना दूँ,
आँखों को अंगार बनाकर सैलाबों को रोक सकूँ मैं,
व्यवधानों के दलदल को मैं पल भर में चट्टान बना दूँ।
– श्रेयांश द्विवेदी
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