शंख बजे, नभ गान सुनाए,
मंगल दीप दिशाएँ जलाएँ।
गरुड़ पंख जब नभ में डोले,
नारायण मुस्कान सजाएँ।
पीताम्बर की स्वर्णिम आभा,
कौस्तुभ की अनुपम झंकार।
श्रीहरि चले लक्ष्मी को लाने,
सज उठा सारा यह संसार।
सागर लहरें नृत्य करें तब,
शेषनाग मुस्काएँ धीरे।
देवों ने पुष्पों की वर्षा की,
गूँजे जयघोष चहुँओर घनेरे।
कमलासन पर बैठी लक्ष्मी,
लज्जा से मुस्काईं धीरे।
नयन मिले जब श्रीहरि से,
खिल उठे कमल हजारों तीरे।
प्रेम जहाँ विश्वास सँवारे,
वहीं सजे वैकुंठ का द्वार।
लक्ष्मी संग जब विष्णु मिलते, मंगलमय होता संसार।
धन से बढ़कर धर्म जहाँ हो,
प्रेम जहाँ हो सबसे न्यारा।
ऐसे श्रीहरि, ऐसी लक्ष्मी,
जग का उजियारा, सुखधारा।
आओ मन में दीप जलाएँ,
प्रेम-भक्ति का हार पिरोएँ।
श्रीहरि-लक्ष्मी की कृपा से,
सुख-समृद्धि से जीवन संजोएँ।
जय श्रीहरि! जय महालक्ष्मी!
मंगलमय हो हर परिवार।
विष्णु-लक्ष्मी की अमर कथा से, सुगंधित हो सारा संसार।
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