डम-डम डमरू नाद उठा,
हर-हर महादेव पुकार।
जटा झुकी तो गंग बह चली,
डोला सारा यह संसार।
रुद्र बने जब नाथ हमारे,
काँपे नभ, पर्वत, भू-धाम।
त्रिनयन से ज्वाला बरसी,
भस्म हुआ हर झूठा नाम।
भाल सुशोभित चंद्र सुहाना,
कंठ सजे विषधर का हार।
भस्म-विभूति तन पर दमके,
रुद्र रूप अपार, अपार।
धा-धिन... धा-धिन... डम-डम बाजे,नाचे शिव अविराम।
एक चरण से जन्म सजे,
दूजे से विश्राम।
तिनका-तिनका अहं झरे जब,जागे अंतर का विश्वास।
तांडव केवल प्रलय नहीं है,
जीवन का नव मधुमास।
नंदी झूमें, गण मुस्काएँ,
देव करें जय-जयकार।
भूत-पिशाच भी भूलें भय को,
सुनकर शिव का हुंकार।
काल स्वयं चरणों में ठहरा,
मृत्यु करे प्रणाम।
महाकाल की महिमा आगे,
झुक जाए हर धाम।
डम-डम डमरू गूँज रहा है,
ॐ की पावन तान।
शिव के तांडव में ही बसता,
सृष्टि का नव-निर्माण।
आओ मन के विष को त्यागें,
त्यागें क्रोध, विकार।
शिव सा निर्मल हृदय सजाएँ,
यही सच्चा श्रृंगार।
डम-डम... डम-डम... नाद अमर है,अनहद जिसकी चाल।
शिव का तांडव गाता जग,
हर-हर शंभु! महाकाल!
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