शिव, अब सुन लो मेरी पुकार,टूट रहा है मन हर बार। सूनी साँसें, सूनी राहें,
आ जाओ बनकर आधार l
जब-जब जीवन रूठ गया है,
अपना भी सब छूट गया है।
तब-तब केवल नाम तुम्हारा,
बनकर दीपक फूट गया है l
डमरू की एक मधुर थाप से,
सोई किस्मत जाग उठे। हर हर की बस एक गूँज से,
टूटे भाग्य भी भाग उठे l
राख नहीं वह भस्म तुम्हारी,
जीवन का है दिव्य श्रृंगार।
जो भी माथे इसे सजाता,
कट जाते उसके अंधकार l
नीलकंठ , तुम विष के स्वामी,पीड़ा का भी लो उपहार। मेरे मन का विष भी पी लो, कर दो निर्मल यह संसार l
ना धन माँगूँ, ना वैभव माँगूँ,
ना ऊँचे महलों का द्वार।
बस इतना वरदान मिले कि,
छूटे न तेरा नाम अपार l
जब तक धड़के प्राण ये मेरे,
जपे हृदय ॐ नमः शिवाय ।
अंतिम श्वास भी यही कहे बस-शिव बिन मेरा कौन सहाए?
आँसू-अँसू बनकर बहता,
तेरे चरणों तक हर भाव।
शिव, अब सुन लो मेरी पुकार, तुम ही जीवन तुम ही आधार l
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