तप की ज्योति, श्रद्धा की शक्ति नंगे पाँव चलीं माँ, पथरीली राहों में,
अडिग रहीं सदा अपने तप की बाँहों में। न मन में कोई भय था, न आँखों में पानी,
ऐसी तपस्विनी हैं माँ ब्रह्मचारिणी।
हाथों में जपमाला, कमंडल की शोभा,चेहरे पर शांति और तप की आभा।
हर साँस में शिव का नाम समाया,हर कण में श्रद्धा का दीप जलाया।
फूलों-सी कोमल, पर्वत-सी अटल,संकल्प में निर्मल, विश्वास में प्रबल।
त्याग की राह पर चलकर दिखाया,सच्चे प्रेम में स्वयं को तपाया।
माँ! मुझे भी इतनी शक्ति देना,दुख में भी विश्वास की ज्योति रखना।
जब राह कठिन हो, मन डगमगाए,तेरा नाम ही मेरे होंठों पर आए।
न धन की चाह हो, न यश की अभिलाषा,मन में रहे बस भक्ति की परिभाषा।
मेरे कर्मों में सच्चाई भर देना,
मेरी वाणी में विनम्रता भर देना।
हे माँ! तेरी तप-ज्योति मन में जले,हर अँधियारा तेरे आशीष से ढले।
तेरे चरणों में मेरी हर कहानी,
जय माँ ब्रह्मचारिणी, जग कल्याणी!
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