डमरू की जब गूँज उठी, काँपा नभ-आकाश,
प्रकट हुए तब भैरव बाबा, लेकर दिव्य प्रकाश।
त्रिशूल धरे, कर खप्पर शोभे, नयनों में तूफ़ान,काल स्वयं भी शीश झुकाए-जय-जय काल महान l
भस्म-विभूषित दिव्य कलेवर, जटा बहे अविराम,
रुद्र रूप में बसते जिनमें, शंभु का ही धाम।
पाप जहाँ भी सिर उठाए, वहीं करें संहार,धर्म-पथों के अटल रक्षक, जग के पालनहार l
कुत्ता जिनका परम सखा है, देता सत्य का ज्ञान,
अहंकारों के घोर अँधेरों में भर देते सम्मान।
दुष्ट हृदय थर-थर काँपे, टूटे हर अभिमान, भक्तों के हित बन जाते हैं, अमृत-सी मुस्कान l
संकट आए लाख भले ही, डिगे न जिसका प्राण,
भैरव भैरव नाम जपे तो, कट जाए हर त्राण।
बंधन टूटें, भय भी रूठे, मिट जाए अज्ञान,एक कृपा की दृष्टि से ही, खिल उठे जीवन-प्राण l
समयचक्र के तुम हो स्वामी, तुमसे जग की चाल,
जन्म-मरण के इस बंधन का, तुम ही अंतिम काल।
चरण-कमल में शीश नवाएँ, लेकर सच्चा मान,
जय-जय श्री काल भैरव, जय शिव के भगवान l
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