न पत्थर केवल पत्थर रहता,
जब छेनी उसको छू जाती है,
न लोहा केवल लोहा रहता,
जब सोच उसे ढल जाती है।
एक विचार से आकार बने,
एक आकार से संसार बने,
जो बिखरी चीज़ों को जोड़ सके,जो असंभव को साकार करे।
कभी रथ बने, कभी महल बने,कभी मंदिर की पहचान बने,कभी मशीनों की गति बने, कभी विज्ञान की उड़ान बने।
हर युग ने जिनसे राह ली,
हर निर्माण ने जिनकी छाप,
उन विश्वकर्मा के नाम से ही
सजती सृजन की हर एक किताब।
आज न केवल पूजा उनकी,
आज विचार भी पूजें हम,
जो निर्माण करे इस धरती का,उस हर कारीगर को मान दें हम।
क्योंकि दुनिया केवल सपनों सेसुंदर नहीं बन पाती है,
जब कोई अपने हुनर से उसे
नई दिशा दिखलाता है।
जहाँ कल्पना आकार बने,
जहाँ मेहनत इतिहास लिखे,
जहाँ सृजन से कल सँवर जाए-समझो वहाँ विश्वकर्मा दिखे।
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