जय-जय पवनपुत्र बलधारी,
रामभक्ति के तुम अधिकारी।
सागर लाँघा, पर्वत उठाया,
संकट में हर साथ निभाया।।
अग्नि बनी जब लंका सारी,
गूँजी जय-जयकार तुम्हारी।
दुष्टों का अभिमान झुकाया,
सत्य का फिर ध्वज फहराया।
सीना चीर दिखाया जग को,
राम बसे हैं अंतरमन को।
प्रेम जहाँ श्रीराम का जागे,
वहाँ स्वयं हनुमंत विराजे।।
भक्ति तुम्हारी शक्ति बनाती,
टूटी हर उम्मीद जगाती।
डर की हर दीवार गिराकर,
साहस का दीपक जलाती।।
हे अंजनी के वीर दुलारे,
दीनों के तुम एक सहारे।
बल दो, बुद्धि दो, निर्मल मन दो,रामचरण का पावन धन दो।
जब-जब मन पर छाए अँधियारा,लेना प्रभु तुम नाम हमारा।
हर श्वास पुकारे एक ही बोली-जय श्रीराम! जय बजरंगबली!
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