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बेटी- घर की मुस्कान

                
                                                         
                            बेटी घर में आती है, तो खुशियों के दीप जलाती है,
                                                                 
                            
अपने नन्हे-नन्हे कदमों से, सूना आँगन महकाती है।
कभी हँसकर रूठ जाती है, कभी प्यार से मनाती है,
वो खुद छोटी-सी होती है, पर घर को बड़ा बनाती है।

पापा की वो लाडली होती, माँ की प्यारी परछाई,
उसकी एक हँसी के आगे, फीकी लगे हर तन्हाई।
छोटी-छोटी बातों में वो, बड़े सपने सजाती है,
अपने हिस्से की खुशियाँ भी, अपनों पर लुटाती है।

वो गुड़िया भी, वो सहेली भी, वो घर की पहचान है,
बेटी सिर्फ एक रिश्ता नहीं, घर की धड़कन और जान है।
कल तक जो आँगन में खेले, कल अपना घर बसाएगी,
फिर भी माँ-बाबा के दिल में, हर पल पास नज़र आएगी।

उसकी विदाई सोचकर ही, आँखें अक्सर भर आती हैं,
बेटियाँ तो पराई होकर भी, सबसे अपनी रह जाती हैं।
जहाँ रहे वो खुशियों से रहे, यही हर दिल की आस रहे,
बेटी के कदमों से हर घर में, प्रेम और विश्वास रहे।

बेटी है तो रंग हैं जीवन में, बेटी है तो त्योहार है,
उसकी प्यारी-सी मुस्कान में, पूरा संसार है।
ईश्वर हर बेटी को दे, सपनों का खुला आसमान,
क्योंकि बेटी केवल बेटी नहीं-वो घर की मुस्कान, और माता-पिता की जान है।
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2 घंटे पहले

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