तेरा नाम अब मेरा विर्द हो गया है,
जैसे ख़ामोशी में कोई दुआ उतरती हो।
न होंठों को ज़रूरत है उसे कहने की,
न दिल को कोई वजह चाहिए याद करने की।
तू दूर है,फिर भी
मेरी हर साँस के बीच कहीं ठहरा हुआ है,
जैसे रूह के अँधेरे में
कोई दीप अनवरत जलता हो।
मैंने तुझे माँगा भी नहीं,
फिर भी तू मेरी प्रार्थनाओं में रहा।
शायद मोहब्बत वही है,
जिसे पाने की ज़िद नहीं होती,
बस जिसका स्मरण
मन को भीतर से पवित्र करता रहता है।
और एक दिन जब मैं स्वयं से भी अनजान हो जाऊँगी,
शायद मेरा वजूद नहीं,
सिर्फ़ तेरा नाम मेरा विर्द रह जाएगा।
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