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वो मिले घड़ी-घड़ी, मगर तलाश बार-बार

                
                                                         
                            ख़्वाबों में एक शख़्स से मिलता हूँ बार-बार,
                                                                 
                            
तहेदिल एक शख़्स को चाहता हूंँ बार-बार।
उसी की ख़्वाहिश में लिखता हूँ, बार-बार,
उसी के तसव्वुर में सोता-जागता हूँ बार-बार

उसकी ख़ुशी में, अपनी ख़ुशी तलाशता हूँं,
रोज़ उसके लिए दुआएँ करता हूँ बार-बार।
जाने ये इश्क़ है, या इबादत का सिलसिला,
उसी को हर नज़्म में निहाँ रखता हूँ बार-बार।

नफ़रत भी उसी शख़्स की भाती है मन को,
मोहब्बत भी वही निसार करता है बार-बार।
उसकी बातों में जाने क्या-क्या पोशीदा है,
तज़ुर्बे कड़वे उसके, इम्तिहां मेरा बार-बार।

सिर से पाँव, उसे बे-ऐब ही देखा है बार-बार,
एक-एक लफ्ज़ को लब से छुआ है बार-बार।
रोज़ मिलता है, फिर भी खोजता हूँ बार-बार
वो मिले घड़ी-घड़ी, मगर दरयाफ़्त बार-बार।

कभी रुठे वो ख़ुद से, कभी मुझसे बार-बार,
बदलता है इरादे अपने भी, मेरे भी बार-बार,
ख़ुद ही उदास, ख़ुद ही मुस्कुराता है बार-बार,
उससे फ़ासले की कोशिशें, नाकाम बार-बार।
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49 मिनट पहले

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