वक्त ने बनाया होगा इस तरह बुतदिल मुझे,
वरना इन गुलाबों में तो हरे काँटे भी न थे।
पूरी भीड़ को अपना समझने की आदत रही,
हमने तो अपने पराए कभी छाँटे भी न थे।
न मालूम उसे मेरा दर्द-ओ-ग़म कैसे पता चला,
मैंने अपने दर्द कभी किसी में बाँटे भी न थे।
मौत हौले-हौले चुपके-चुपके छीन ले गई साँसें,
साँसों को बाँधने रोकने के कहीं खँूटे भी न थे।
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