सुनो!
इन फूलों को तुम एक बार
हथेली में बंद करके देखो
ठीक मेरी धड़कनें
सुनाई देंगी तुम्हें
हर स्पंदन में तुम और तुम्हारा नाम।
वो जो कालेज के पूरबी बगीचों में
गेंदा गुलाब गुड़हल थे न,
जिनकी झुरमुटों में हम-तुम
अक्सर पहरों तक
एक-दूजे में खोेए रहते थे,
फिर वही काइनात तुम्हें याद आएगी।
कहाँ ठहरती है यादों की बारात
कहाँ सिमटते हैं सपने सीने तक
कहाँ कटती है विरह की रातें
कहाँ पूरी हो पाती हैं,
तुम्हारी मेरी रूमानी बातें
तुम झगड़ती हो, मैं मुस्कुराता हूँ
तुम बुलाती हो, मैं पास आता हूँ
तुम खिलखिलाती हो, होंठ चूम लेता हूँ।
सुनो,
ये जो लाल बिंदी है न तुम्हारीे,
मुझे तुमसे कहीं अधिक प्रेम इसी से है,
बार-बार चेहरा दिखाकर
तुम जो गुम हो जाती हो,
कुछ देर, मुस्कुराकर, रूठ जाती हो,
और ये जो नयनों, पलकों की तस्वीर
तुम अक़्सर शाया कर लेती हो,
मेरे लिए यही पहचान है तुम्हारी,
मुझे तुम्हारी हँसी से कहीं अधिक
तुम्हारे रूठने से प्रेम है।
और सुनो
ये जो काटती विरही रातों में,
मस्तानी शाम से, सुहानी सुबहों तक
दुनियाभर मन भटक कर,
मैं एक ही प्रेम राग गाने लगा हूँ न,
इनमें तुम्हीं तुम हो,
और तुम्हारा आंतरिक सौंदर्य है,
वो सौंदर्य जिसे न तुम जानती हो,
न तुम्हारे अतीत-आगम के प्रेमी जन,
तुम्हारे सौंदर्य को किसी ने पहचाना नहीं ,
तुम्हारे होंठ, नाज़ुक उँगलियाँ चूमी बहुत
किंतु तुम्हारे हृदय को कभी किसी ने छुआ ही नहीं।
मैं प्रेम की एक अबूझ पहेली
तुम्हें सौंपकर जाऊँगा
जिसमें न तुमसे मिलने की तमन्ना है मुझे,
न कभी तुम्हें छूने की लालसा है मुझे,
और न मुझे पाने की इच्छा है तुम्हें,
न तुम्हें पाने की तीव्रता है मुझे;
किंतु कोई प्रेम-गणित है,
जिसे न तुम सुलझा पाते हो, न ही मैं,
जिसे उत्तीर्ण किए बिना,
न तुम उस पार जा पाओगे, न ही मैं।
-श्रीधर
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