मेरी मक़बूलियत पे, जाने वो इतना हैराँ क्यों है,
शायरी अल्लाह की देन है, मुझसे परेशाँ क्यों है।
नज़रअंदाज़ कर ली सारी ख़ताएं उसकी हमने,
मेरा महबूब जाने फिर भी, इतना पशेमाँ क्यों है।
अरसा इसरार करता रहा जो हमसे मिलने को,
न मिल सके हम तोे, बज़्म उसका वीरां क्यों है।
रोज़ नई आशिक़ी, तर्के-मोहब्बतें ज़ुदा-जुदा,
ए! मोहब्बत, अब तू इस कदर आसां क्यों है।
रानाई-ए-कौनेन लेकर आए थे दुनिया में आप,
किस-किस ने तोड़ा दिल, और ये िख़जाँ क्यों है।
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