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कहा, पोशीदा गली से आया-जाया करो जिगर में।

                
                                                         
                            ख़याल उनका, कुछ इस तरह आता है जिगर में
                                                                 
                            
अलग-सी ख़ुशबू जुदा-सी कद्र होती है जिगर में।

उनकी अगर-मगर में जाने, कितने दौर बीते और,
चाँद दरीचे से न उतरा, ताउम्र इंतज़ार जिगर में।

तमाम चादरें ओढ़ के, सो तो लेता मैं भी मगर,
कैसे बंद हो, उनकी यह आवा-जाही जिगर में।

गंगोत्री से गंगासागर, अनगिनत तीरध नहा लिए,
नहीं धुलता नाम उनका, जो शाया है जिगर में।

वो न करें इकबाल-ए-शिद्दत, मनमर्जियाँ उनकी,
कुछ न कुछ चुलबुली तो है, उनके भी जिगर में।

उनका रूठना, ख़ुद ही मुस्काना कैसी पहेली है,
ज़फ़ा-दर-ज़फ़ा देखी, मगर पाक़ीज़गी जिगर में।

आम रास्ते बंद कर दिए उसने मेरे ख़िलाफ़ मंज़र ,
कहा, पोशीदा गली से आया-जाया करो जिगर में।
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33 minutes ago

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