हिन्दी को शत-शत नमन मेरा
मनु श्रद्धा के साथ जन्मी
संस्कृत से उपजती पनपती फ़लती
वेदों से परिष्कृत हो चहकती
भारतभूमि के उतार चढ़ाव को देखती
गंगा यमुना कावेरी के साथ बहती
कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक स्वर में
पंजाब से असम तक, गुँजित होती
युग-युग से मावनता का गीत गाती
हिन्दी को मेरा नमन!
जो कुरूक्षेत्र में खड़े अर्जुन को ज्ञान देती
जो सकल विश्वमानवता को,
सभ्यता को
शांति, अहिंसा, प्रेम का संदेश देती
शब्द-शब्द जिसका मानवीय मर्यादा हो
गांधी, टैगोर, नेहरू,विनोबा का गीत बनी
खण्ड-खण्ड को जोड़कर जिसने
भारतवर्ष को एक देश बनाया
हिन्दी को मेरा नमन!
कभी नटराज के नृत्य की भाषा
कभी धूर्जटि के केशों के कुंतल
मर्यादा पुरूषोत्तम के मुखारविन्दों से छलकी
महर्षि व्यास की तूलिका से फली-फूली
सुगन्धवत् भारतभूमि पर सनसन बहती
जन-जन के प्राणों की सरिता
वन्दे मातरम् और जन-गण-मन पिरोती,
हिन्दी को शत-शत नमन मेरा !
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X