लिल्लाह! इस दिल को अब समझाए कोई,
उम्र बढ़ रही है, पर फ़ाक़ामस्ती घटती नहीं।
फ़ारिग़ हो चुका हूँ, गोया जिम्मेदारियों से,
रोज़ नई नज़्म कहने की आदत छूटती नहीं।
मुल्क़ में मुठ्ठी भर का दबदबा है आज भी,
हक़ीक़त कहने में हमारी ज़ुबां रुकती नहीं।
सोचता हूँ मैं भी बेवफ़ा आवारा हो जाऊँ,
उम्रभर की वफ़ापरस्ती में रातें कटती नहीं।
वकालत में वक़ार, एक-दूजे के दुश्मन यार,
मगर हम हैं कि ईमानदारी कहीं रुकती नहीं।
जश्न-ए-अदब में हसीनों का मजमा होता है,
बात क्या है उसके चेहरे से नज़र हटती नहीं।
यादें माज़ी की, जानलेवा दर्द ही दर्द देती हैं,
है कहीं कोई आग, सावन में भी बुझती नहीं।
दिल की गिरह पड़ती रही, कहीं न कहीं,
मंज़र मिटने को आया, आदत मिटती नहीं।
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