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शीर्षक - विकास

                
                                                         
                            दिनों-दिन अखबार में दिखता
                                                                 
                            
धरातल में न उतर पाता
भारी होता विकास का पेट
लेता जाता हर किसी से भेंट।
बदहजमी न होगी उसको
अति भरपेट से खाएं वो।
विकास भागता है चहुंओर
नज़र न आता है किसी ओर।
रोड पर लोड होगा जहां
गड्ढे में विकास दिखेगा वहां।
नदियों के पुल जो भारी
प्यास के मारे गिरना जारी।
दफ्तर की वो फाइल निराली
दबे विकास की राह निकाली।
पक्के होते विकास के दावे
कच्चे में ही भरभरा जावे।
विकास की गति में ढोलम पोल
कागज़ों में दौडेगा गोलम गोल।
देश को मिलता वो विकास
पहले घर का करता जो विकास।
नाम विकास काम विकास
अदृश्य है जो वहीं विकास।
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2 महीने पहले

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