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शीर्षक -उधेडबुन

                
                                                         
                            जीवन एक लंबी डगर है
                                                                 
                            
मन की उधेड़बुन ज़ारी है।
डगमगाते कदम ढूंढते छोर
पहुंचे जब चौराहे की ओर।
कौन दिशा में जाएं हम
यही समझ न पाएं हम।
सही-ग़लत के मिले दोराहे
कही गलत न हो वो राहें।
इन राहों पर मिलेंगे अनजाने कई
पहचान न पाएंगें उनको कोई।
वाणी में जिनकी मधुरता होगीं
थाह न उनकी कभी मिलेगी ।
विचारों में उधेड़बुन ज़ारी होगी
विश्वास अविश्वास की ऊहापोह होगी।
सफल असफल की है वो दौड़
जीवन भर हैं इसी की होड़।
दिल दिमाग के बीच जो बसती
उधेड़बुन का संघर्ष जारी रखती।
सोचों यह उधेड़बुन क्यूं जारी है
अनहोनी की शंका होना जो भारी है।
जीवन की यह डगर आसान न हो
उधेड़बुन के धागे में जो रची-बसी हो।
खट्टे मीठे अनुभव मिले हैं जिसमें
वैचारिक उधेड़बुन का धरातल हैं इसमें।
चंद समय चक्षुओं को बंद कर सोचो
चंद समय शांतचित्त बनकर देखो
फिर उधेड़बुन नदारद दिखेंगी
जीवन को नई डगर मिलेगी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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