धीमे-धीमे सुलग रही
आक्रोश की भट्टी में तप रही
कहीं न सुनवाई होगी
मन में भावना हावी होगी ।
बरसों से दिलों में आग है
बेहाल सिस्टम से निराश हैं
आमजन को समझे कीट पतंग
जो ऊंची कुर्सी पर विराजे लोग।
दिलों में धधकती वो मशाल
बदलाव की चाह रखे वो मशाल
विचारों से जलती वो मशाल
कदमताल में दिखती वो मशाल।
न अब बापू न अब सुभाष
न वो भगतसिंह न वो आजाद
फिर भी मशाल जल उठी
सन सत्तावन जैसी भड़क उठी।
राह में उतरे जब जन-जन
डर गए सब नेतागण
वो मशाल न इंतकाम की
वो मशाल न सत्ताबदली की।
वो मशाल है जुनून की
वो मशाल हैं जनमानस की
जो परिवर्तन की चाह रखे
जो मताधिकार की चाह रखे।
जनमत में है विश्वास उसका
जनतंत्र में है श्वास उसका।
जनमानस जब जाग उठे
इक चिंगारी भड़क उठे
उस चिंगारी से जले जो मशाल
जलती रहेगी वो अनंत काल।।
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